डिज़ाइन एथिक्स और सस्टेनेबिलिटी वो राज़ जो आपकी बचत बढ़ाएंगे और चौंका देंगे

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हम सब अपने आस-पास अनगिनत डिज़ाइन देखते हैं – सुबह की कॉफी के कप से लेकर हमारे स्मार्टफोन तक। कभी सोचा है कि इनका हमारे जीवन पर कितना गहरा असर होता है?

मुझे याद है, जब मैंने पहली बार किसी प्रोडक्ट की ‘लाइफ साइकिल’ के बारे में पढ़ा था, तो मैं दंग रह गया था कि एक छोटी सी चीज़ भी कितनी बड़ी कहानी कह सकती है, उसकी शुरुआत से लेकर उसके अंत तक।आजकल, जब ‘फास्ट फैशन’ और हर साल नए गैजेट्स का चलन बढ़ गया है, तो डिज़ाइन सिर्फ़ ‘अच्छा दिखने’ से कहीं ज़्यादा हो गया है। यह अब हमारी नैतिकता और पृथ्वी की स्थिरता से जुड़ा एक सवाल बन गया है। क्या हम सिर्फ़ बेचने के लिए डिज़ाइन कर रहे हैं या फिर एक बेहतर, टिकाऊ भविष्य के लिए?

आजकल की एआई-संचालित दुनिया में, यह सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है कि हम तकनीकी प्रगति का उपयोग नैतिक रूप से और पर्यावरण के लिए ज़िम्मेदार तरीके से कैसे करें।यह सिर्फ़ एक नया ‘ट्रेंड’ नहीं है, बल्कि एक अनिवार्य बदलाव है – ऐसा बदलाव जहाँ डिज़ाइन सिर्फ़ उपभोक्ताओं की ज़रूरतों को पूरा नहीं करता, बल्कि ग्रह और समाज की भलाई का भी ध्यान रखता है। हमें ऐसे डिज़ाइनरों की ज़रूरत है जो केवल समस्याएँ हल न करें, बल्कि भविष्य की समस्याओं को भी रोकें।आओ, नीचे दिए गए लेख में विस्तार से जानें।

पर्यावरण-अनुकूल डिज़ाइन की नई सुबह

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हाल ही में मुझे एक ऐसे स्टार्ट-अप के बारे में पता चला जो पूरी तरह से पुनर्चक्रित सामग्री से फर्नीचर बनाता है। मैंने सोचा, वाह! यह तो कमाल की बात है। जब मैंने उनके एक स्टूल को छुआ, तो मुझे लगा कि इसमें सिर्फ़ लकड़ी नहीं, बल्कि एक कहानी है – पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदारी की कहानी। पहले हम सोचते थे कि डिज़ाइन सिर्फ़ सुंदरता के लिए होता है, लेकिन अब यह पर्यावरण पर पड़ने वाले हमारे प्रभावों को कम करने का एक शक्तिशाली औज़ार बन गया है। मेरा मानना है कि हर डिज़ाइनर को अब न सिर्फ़ ‘कितना सुंदर दिखता है’ बल्कि ‘कितना टिकाऊ है’ इस पर भी ध्यान देना होगा। हमें उन उत्पादों को बनाना बंद करना होगा जो एक ही बार इस्तेमाल करके फेंक दिए जाते हैं। यह सोचने वाली बात है कि कैसे एक छोटा सा बदलाव, जैसे कि पैकेजिंग को प्लास्टिक-मुक्त बनाना, पूरे उद्योग पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है। मैंने खुद देखा है कि जब कोई ब्रांड ऐसा करता है, तो ग्राहक कैसे उसे हाथों-हाथ लेते हैं। यह सिर्फ़ नैतिक नहीं, बल्कि व्यावसायिक रूप से भी समझदारी भरा कदम है।

1. चक्रवर्ती अर्थव्यवस्था का बढ़ता महत्व

मैंने हमेशा सुना था कि ‘कुछ भी बर्बाद नहीं होता’, लेकिन डिज़ाइन की दुनिया में यह बात अब और भी सच लगने लगी है। चक्रवर्ती अर्थव्यवस्था (Circular Economy) का मतलब है कि हम उत्पादों को इस तरह से डिज़ाइन करें कि उनके जीवनकाल के बाद भी उनका उपयोग किया जा सके, या उन्हें पुनर्चक्रित किया जा सके। मैंने खुद महसूस किया है कि जब मैं कोई ऐसा प्रोडक्ट खरीदता हूँ, जिसे दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है, तो एक अलग तरह की संतुष्टि मिलती है। जैसे मेरे पास एक पानी की बोतल है, जिसे मैं सालों से इस्तेमाल कर रहा हूँ और यह मुझे हर बार याद दिलाती है कि मैं पर्यावरण के लिए कुछ अच्छा कर रहा हूँ। यह सिर्फ़ कचरा कम करने के बारे में नहीं है, बल्कि संसाधनों का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग करने और नए मूल्य बनाने के बारे में भी है। आजकल के स्मार्टफ़ोन भी इस दिशा में कुछ कर सकते हैं, जैसे उन्हें मॉड्यूलर बनाना ताकि खराब होने वाले पुर्जे बदले जा सकें, न कि पूरा फ़ोन फेंक दिया जाए। यह एक ऐसी सोच है जो डिज़ाइनर को उत्पाद के ‘अंत’ को उसके ‘शुरुआत’ में ही सोचने पर मजबूर करती है।

2. सामग्री की पसंद में क्रांति

मुझे याद है जब हम बच्चे थे तो खिलौने प्लास्टिक के होते थे, और अगर टूट जाते तो उन्हें फेंक दिया जाता था। आज, मैं देखता हूँ कि कई कंपनियाँ ऐसे खिलौने बना रही हैं जो लकड़ी या मकई के स्टार्च जैसे बायोडिग्रेडेबल पदार्थों से बने हैं। यह देखकर खुशी होती है कि हम आगे बढ़ रहे हैं। सामग्री का चुनाव अब डिज़ाइन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। हम सिर्फ़ मज़बूती या सुंदरता नहीं देख रहे, बल्कि यह भी देख रहे हैं कि इसे बनाने में कितनी ऊर्जा लगी, यह कहाँ से आया और इसका निपटान कैसे होगा। मेरे दोस्त ने एक ऐसा किचन टॉवल खरीदा जो बाँस से बना था, और उसने बताया कि यह सिर्फ़ टिकाऊ ही नहीं बल्कि बहुत प्रभावी भी है। इससे पता चलता है कि पर्यावरण-अनुकूल सामग्री गुणवत्ता से समझौता नहीं करती। डिज़ाइनर अब समुद्री प्लास्टिक, मशरूम-आधारित सामग्री और यहाँ तक कि पौधों के कचरे से भी नए उत्पाद बना रहे हैं। यह एक रोमांचक दौर है जहाँ हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि भविष्य में कौन सी नई सामग्री हमें देखने को मिलेगी और वे हमारे जीवन को कैसे बदलेंगी।

उपभोक्ता के व्यवहार को समझना और बदलना

मुझे आज भी याद है जब मैंने पहली बार एक ऐसा ऐप इस्तेमाल किया जो मुझे बताता था कि मेरा खाना बर्बाद होने से पहले मैं उसे कैसे उपयोग कर सकता हूँ। यह मेरे लिए एक आँख खोलने वाला अनुभव था। डिज़ाइन सिर्फ़ उत्पाद बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे व्यवहार को भी प्रभावित करता है। हम कैसे चीज़ों का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें कब फेंकते हैं, और नया कब खरीदते हैं – यह सब डिज़ाइन से प्रभावित होता है। आजकल के डिज़ाइनरों को सिर्फ़ उत्पाद नहीं, बल्कि एक पूरी ‘सेवा’ डिज़ाइन करनी होती है जो लोगों को बेहतर और अधिक ज़िम्मेदार विकल्प चुनने के लिए प्रोत्साहित करे। मैंने देखा है कि जब कंपनियाँ अपने उत्पादों को किराए पर देने या साझा करने का विकल्प देती हैं, तो लोग उन्हें पसंद करते हैं क्योंकि यह न केवल सस्ता होता है, बल्कि पर्यावरण के लिए भी अच्छा होता है। यह सिर्फ़ ‘बिक्री’ से आगे बढ़कर ‘उपयोग’ को महत्व देने की बात है। मुझे लगता है कि यह एक बड़ी चुनौती है, लेकिन साथ ही एक बड़ा अवसर भी है, जहाँ हम अपने रोज़मर्रा के जीवन में छोटे-छोटे बदलाव लाकर बड़े परिणाम देख सकते हैं।

1. उत्पाद जीवनचक्र का विस्तार

जब मैंने अपना पहला लैपटॉप खरीदा था, तो मुझे लगा था कि यह 2-3 साल ही चलेगा। लेकिन आज, मैं अपने उपकरणों को सालों तक इस्तेमाल करने की कोशिश करता हूँ, उनकी मरम्मत करवाता हूँ, और अगर ज़रूरत पड़े तो अपग्रेड भी करता हूँ। यह सोच अब डिज़ाइन में भी शामिल हो रही है। डिज़ाइनर अब ऐसे उत्पाद बना रहे हैं जिन्हें आसानी से मरम्मत किया जा सके, जिनके पुर्जे बदले जा सकें, और जो लंबे समय तक चलें। मैंने एक बार एक कहानी पढ़ी थी कि कैसे एक जूते की कंपनी अपने जूतों को मुफ्त में मरम्मत करती है, ताकि लोग नए जूते न खरीदें। यह सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा। यह न केवल ग्राहक के लिए फायदेमंद है, बल्कि ग्रह के लिए भी अच्छा है। ‘Planned Obsolescence’ यानी जानबूझकर उत्पादों को कम समय तक चलने वाला बनाने का ज़माना अब ख़त्म होना चाहिए। हमें ऐसे डिज़ाइनरों की ज़रूरत है जो चीज़ों को ‘बनाओ, इस्तेमाल करो, फेंको’ की बजाय ‘बनाओ, इस्तेमाल करो, मरम्मत करो, दोबारा इस्तेमाल करो’ की मानसिकता से बनाएँ।

2. व्यवहारिक प्रोत्साहन के ज़रिए बदलाव

मुझे लगता है कि हम सभी को थोड़ी सी प्रेरणा की ज़रूरत होती है। जब मेरा फिटनेस ट्रैकर मुझे बताता है कि मैंने आज कितने कदम चले, तो मुझे और चलने का मन करता है। इसी तरह, डिज़ाइन भी हमें पर्यावरण के अनुकूल व्यवहार करने के लिए प्रेरित कर सकता है। मैंने एक बार एक कूड़ेदान देखा था जो आपको कचरा अलग-अलग करने के लिए प्रोत्साहित करता था – वह एक गेम की तरह था। यह ‘गेमिफ़िकेशन’ का एक शानदार उदाहरण है। डिज़ाइनर अब ऐसे इंटरफ़ेस और उत्पाद बना रहे हैं जो हमें कम पानी का उपयोग करने, कम बिजली खर्च करने, या कचरा कम करने के लिए प्रेरित करते हैं। यह सिर्फ़ ‘क्या करना चाहिए’ बताने से कहीं ज़्यादा है; यह हमें यह महसूस कराता है कि हमारे छोटे-छोटे प्रयास भी मायने रखते हैं। जब लोग देखते हैं कि उनके व्यवहार से वास्तव में कोई फर्क पड़ रहा है, तो वे और भी प्रेरित होते हैं। यह एक कला है – लोगों को यह दिखाए बिना बदलना कि आप उन्हें बदल रहे हैं।

डिजिटल दुनिया में नैतिक डिज़ाइन की चुनौती

जिस तरह से एआई और डिजिटल तकनीकें हमारे जीवन में गहराई से उतर रही हैं, मुझे लगता है कि अब हमें डिज़ाइन के नैतिक पहलुओं पर और भी अधिक ध्यान देना होगा। मैंने खुद देखा है कि कैसे एक गलत एल्गोरिथम किसी समुदाय को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है। डिज़ाइन अब सिर्फ़ भौतिक उत्पादों तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल इंटरफ़ेस, एआई एल्गोरिथम और डेटा प्राइवेसी तक फैल गया है। एक एआई चैटबॉट जो लोगों के सवालों का जवाब देता है, उसे भी ‘डिज़ाइन’ किया जाता है, और उसकी प्रतिक्रियाएँ नैतिक होनी चाहिए। मुझे याद है, एक बार मैंने एक ऐप इस्तेमाल करना बंद कर दिया क्योंकि मुझे लगा कि वह मेरी निजी जानकारी का गलत इस्तेमाल कर रहा है। यह विश्वास का मामला है। अगर हम चाहते हैं कि लोग इन तकनीकों को अपनाएँ, तो हमें उन्हें यह विश्वास दिलाना होगा कि उनका इस्तेमाल नैतिक और ज़िम्मेदार तरीके से किया जा रहा है। यह एक ऐसी चुनौती है जिसे हमें नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।

1. डेटा प्राइवेसी और सुरक्षा में डिज़ाइन की भूमिका

जब मैं ऑनलाइन कुछ खरीदता हूँ, तो मुझे चिंता होती है कि मेरी जानकारी कहाँ जा रही है। यह एक ऐसा डर है जो बहुत से लोगों को होता है। डेटा प्राइवेसी अब सिर्फ़ कानूनी मसला नहीं, बल्कि डिज़ाइन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। डिज़ाइनर को यह सोचना होगा कि उपयोगकर्ता का डेटा कैसे इकट्ठा किया जाएगा, कैसे संग्रहीत किया जाएगा और कैसे उपयोग किया जाएगा। मैंने एक ऐसा ऐप देखा जिसमें ‘प्राइवेसी डैशबोर्ड’ था, जहाँ मैं अपनी सभी डेटा सेटिंग्स को आसानी से देख और बदल सकता था। यह मेरे लिए एक बहुत ही संतोषजनक अनुभव था क्योंकि इसने मुझे नियंत्रण का एहसास कराया। डिज़ाइनर अब ‘प्राइवेसी-बाय-डिज़ाइन’ के सिद्धांत पर काम कर रहे हैं, जिसका अर्थ है कि प्राइवेसी को उत्पाद या सेवा के विकास की शुरुआत से ही एक मुख्य विशेषता के रूप में शामिल किया जाता है। यह सिर्फ़ उपयोगकर्ताओं को सुरक्षित महसूस कराना नहीं है, बल्कि उन्हें वास्तव में सुरक्षित रखना भी है।

2. एल्गोरिथम निष्पक्षता और पूर्वाग्रहों से मुक्ति

आजकल, एआई एल्गोरिथम हमारी नौकरियों से लेकर हमारे ऋण आवेदनों तक हर चीज़ को प्रभावित कर रहे हैं। मुझे याद है, एक बार एक मित्र को नौकरी नहीं मिली क्योंकि एआई-आधारित भर्ती प्रणाली ने उसे ‘उपयुक्त’ नहीं माना, जबकि उसके पास सारे गुण थे। यह सुनकर मुझे बहुत गुस्सा आया। यह एक गंभीर नैतिक चिंता है। डिज़ाइनर को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके द्वारा डिज़ाइन किए गए एल्गोरिथम निष्पक्ष हों और किसी भी तरह के पूर्वाग्रहों से मुक्त हों। इसका मतलब है कि विभिन्न डेटा सेट पर परीक्षण करना, विविधता को शामिल करना और लगातार निगरानी करना। यह सिर्फ़ ‘टेक्निकल’ काम नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक ज़िम्मेदारी भी है। हमें ऐसे एआई सिस्टम बनाने होंगे जो सभी के लिए निष्पक्ष और न्यायपूर्ण हों, न कि केवल कुछ लोगों के लिए। यह एक ऐसी लड़ाई है जिसमें हर डिज़ाइनर को अपनी भूमिका निभानी होगी।

समावेशी डिज़ाइन: सभी के लिए पहुँच

मुझे याद है, मेरे दादाजी को स्मार्टफोन इस्तेमाल करने में बहुत दिक्कत होती थी क्योंकि आइकॉन बहुत छोटे थे। तब मुझे एहसास हुआ कि डिज़ाइन को सिर्फ़ एक वर्ग के लोगों के लिए नहीं, बल्कि सभी के लिए होना चाहिए। समावेशी डिज़ाइन (Inclusive Design) का मतलब है कि हम ऐसे उत्पाद और सेवाएँ बनाएँ जो हर किसी के लिए सुलभ हों, चाहे उनकी उम्र, क्षमता या पृष्ठभूमि कुछ भी हो। यह सिर्फ़ ‘अच्छा दिखने’ से कहीं ज़्यादा है; यह लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के बारे में है। मैंने एक बार एक वेबसाइट देखी जो दृष्टिबाधित लोगों के लिए ऑडियो विवरण प्रदान करती थी, और मुझे लगा कि यह कितना शानदार विचार है। यह न केवल उनके लिए उपयोगी था, बल्कि इसने मुझे एक इंसान के रूप में बेहतर महसूस कराया। यह सिर्फ़ ‘चेकबॉक्स’ भरने की बात नहीं है, बल्कि यह सहानुभूति और समझ की बात है। जब हम समावेशी डिज़ाइन को अपनाते हैं, तो हम न केवल अधिक लोगों तक पहुँचते हैं, बल्कि हम एक अधिक न्यायपूर्ण और समान समाज का निर्माण भी करते हैं।

1. उम्र और क्षमता के अनुकूल डिज़ाइन

मेरे एक दोस्त की दादी को एक बैंक ऐप इस्तेमाल करने में बहुत परेशानी होती थी क्योंकि उसका इंटरफ़ेस बहुत जटिल था। यह दिखाता है कि हमें उम्र और क्षमता को ध्यान में रखते हुए डिज़ाइन करने की कितनी ज़रूरत है। डिज़ाइनर को यह सोचना होगा कि उनके उत्पाद का इस्तेमाल कौन-कौन करेगा – बच्चे, बूढ़े, विकलांग लोग, या ऐसे लोग जिनकी तकनीकी समझ कम है। मैंने एक ऐसा टीवी रिमोट देखा जिसमें सिर्फ़ बड़े बटन थे, और यह मेरे दादाजी के लिए एकदम सही था। यह सरल था, लेकिन बहुत प्रभावी। इसमें ऐसे फ़ॉन्ट शामिल हो सकते हैं जो पढ़ने में आसान हों, कंट्रास्ट जो स्पष्ट हो, और इंटरैक्शन जो सहज हों। यह सिर्फ़ ‘उपयोगकर्ता-केंद्रित’ होने से आगे बढ़कर ‘मानव-केंद्रित’ होने की बात है, जहाँ हम हर इंसान की ज़रूरतों और सीमाओं को समझते हैं। जब हम सभी के लिए डिज़ाइन करते हैं, तो हम वास्तव में सभी के लिए बेहतर डिज़ाइन करते हैं।

2. सांस्कृतिक संवेदनशीलता और स्थानीयकरण

जब मैंने पहली बार जापान में एक भारतीय रेस्टोरेंट देखा, तो मुझे लगा कि उन्होंने भारतीय संस्कृति को कितनी खूबसूरती से समझा और अपने डिज़ाइन में शामिल किया। यह सांस्कृतिक संवेदनशीलता का एक बेहतरीन उदाहरण है। डिज़ाइनर को यह समझना होगा कि विभिन्न संस्कृतियों में रंग, प्रतीक और व्यवहार के अलग-अलग अर्थ होते हैं। एक डिज़ाइन जो एक देश में सफल होता है, वह दूसरे देश में विफल हो सकता है अगर सांस्कृतिक बारीकियों को ध्यान में न रखा जाए। मैंने एक ऐसा वैश्विक ब्रांड देखा जिसने अपने उत्पादों की पैकेजिंग को स्थानीय त्योहारों और परंपराओं के अनुसार अनुकूलित किया था, और उन्हें स्थानीय लोगों ने बहुत पसंद किया। यह सिर्फ़ ‘अनुवाद’ करने से कहीं ज़्यादा है; यह ‘समझने’ और ‘अनुकूलित’ करने के बारे में है। जब हम सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील डिज़ाइन करते हैं, तो हम न केवल ग्राहकों के साथ बेहतर संबंध बनाते हैं, बल्कि हम सांस्कृतिक विविधता का सम्मान भी करते हैं।

डिजाइन की नैतिकता: एक नया मानक

जब मैंने एक बार एक ऐसा विज्ञापन देखा जो बच्चों को अस्वास्थ्यकर स्नैक्स खरीदने के लिए उकसा रहा था, तो मुझे बहुत बुरा लगा। मुझे लगा कि क्या डिज़ाइनर की कोई नैतिक ज़िम्मेदारी नहीं होती? यह सिर्फ़ उत्पाद बनाने की बात नहीं है, बल्कि यह इस बात की भी है कि हम उन उत्पादों के माध्यम से समाज को क्या संदेश दे रहे हैं। नैतिक डिज़ाइन का मतलब है कि हम अपने काम के सामाजिक, पर्यावरणीय और मानवीय प्रभावों पर विचार करें। यह सिर्फ़ ‘क्या हम कर सकते हैं’ से कहीं ज़्यादा ‘क्या हमें करना चाहिए’ पर ध्यान केंद्रित करता है। मैंने एक बार एक कंपनी के बारे में पढ़ा जिसने अपने उत्पादों में किसी भी तरह के लत लगाने वाले तत्वों का इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया था, भले ही इससे उन्हें कम राजस्व मिलता। यह एक साहसिक निर्णय था, लेकिन यह दिखाता है कि वे अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी को कितनी गंभीरता से लेते हैं। यह एक ऐसा मानक है जिसे हर डिज़ाइनर को अपनाना चाहिए, क्योंकि हमारे काम का असर सिर्फ़ उत्पादों तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह पूरे समाज पर पड़ता है।

1. लालच बनाम ज़रूरत: डिज़ाइन का नैतिक दुविधा

हम सभी को नए गैजेट्स पसंद हैं, लेकिन क्या हमें हर नए गैजेट की ज़रूरत होती है? अक्सर, मार्केटिंग और डिज़ाइन हमें उन चीज़ों को खरीदने के लिए उकसाते हैं जिनकी हमें ज़रूरत नहीं होती। यह एक नैतिक दुविधा है। डिज़ाइनर को यह सोचना होगा कि वे लोगों की वास्तविक ज़रूरतों को कैसे पूरा कर सकते हैं, न कि सिर्फ़ उनके लालच को कैसे भुना सकते हैं। मैंने एक बार एक डॉक्यूमेंट्री देखी थी जिसमें बताया गया था कि कैसे कुछ कंपनियाँ जानबूझकर ऐसे उत्पाद बनाती हैं जो लोगों को लगातार ‘अपग्रेड’ करने के लिए मजबूर करते हैं। यह एक शोषणकारी प्रथा है। हमें ऐसे डिज़ाइनरों की ज़रूरत है जो ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ काम करें, जो लोगों को सूचित विकल्प चुनने में मदद करें, न कि उन्हें धोखा दें। यह एक मुश्किल रास्ता है, लेकिन यह एकमात्र सही रास्ता है।

2. डिज़ाइन में पारदर्शिता और जवाबदेही

जब कोई उत्पाद टूट जाता है, तो मुझे जानना होता है कि उसे कैसे ठीक करना है, या अगर यह पर्यावरण के लिए बुरा है, तो मुझे जानना होता है कि क्यों। यह पारदर्शिता की बात है। डिज़ाइनर को अपने काम में पारदर्शी और जवाबदेह होना चाहिए। इसका मतलब है कि वे अपनी सामग्री के स्रोत, निर्माण प्रक्रियाओं और उत्पादों के जीवनकाल के बारे में जानकारी प्रदान करें। मैंने एक बार एक कॉफी ब्रांड देखा जिसने अपनी कॉफी के हर चरण को ट्रैक करने का विकल्प दिया था, खेत से लेकर मेरे कप तक। यह बहुत ही विश्वसनीय लगा। पारदर्शिता केवल लेबल पर सामग्री सूची छापने से कहीं ज़्यादा है; यह एक कहानी बताने और उसके पीछे खड़े होने की बात है। जब हम अपने काम में जवाबदेह होते हैं, तो हम न केवल ग्राहकों का विश्वास जीतते हैं, बल्कि हम उद्योग में एक बेहतर मानक भी स्थापित करते हैं।

भविष्य के डिज़ाइनर के लिए कौशल सेट

मुझे याद है जब मैंने अपनी पहली डिज़ाइन क्लास ली थी, तो मुझे लगा था कि यह सिर्फ़ कला के बारे में है। लेकिन आज, मैं देखता हूँ कि डिज़ाइनर को बहुत कुछ जानना होता है – मनोविज्ञान, इंजीनियरिंग, व्यवसाय और यहाँ तक कि पर्यावरण विज्ञान भी। भविष्य के डिज़ाइनर को सिर्फ़ सुंदर चीज़ें बनाना नहीं जानना होगा, बल्कि उन्हें दुनिया की समस्याओं को समझना और उन्हें हल करना भी जानना होगा। मैंने एक ऐसे डिज़ाइनर से बात की जिसने बताया कि वह अब सिर्फ़ उत्पादों को ‘ड्रॉ’ नहीं करता, बल्कि वह डेटा का विश्लेषण करता है, यूज़र रिसर्च करता है, और यहाँ तक कि सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ भी काम करता है। यह एक बहु-विषयक दृष्टिकोण है। मुझे लगता है कि यह एक रोमांचक समय है क्योंकि डिज़ाइनर अब सिर्फ़ ‘विशेषज्ञ’ नहीं रहे, बल्कि वे ‘समस्या-समाधानकर्ता’ बन गए हैं। यह सिर्फ़ ‘क्या है’ के बारे में नहीं है, बल्कि ‘क्या हो सकता है’ के बारे में है।

1. अंतर्विषयक सोच का विकास

जब मैंने अपने कॉलेज के दिनों में विभिन्न विषयों के दोस्तों के साथ काम करना शुरू किया, तो मैंने महसूस किया कि अलग-अलग दृष्टिकोणों से कितनी नई और रचनात्मक बातें सामने आती हैं। भविष्य के डिज़ाइनर को अंतर्विषयक सोच (Interdisciplinary Thinking) विकसित करनी होगी। इसका मतलब है कि उन्हें सिर्फ़ अपने डिज़ाइन के क्षेत्र तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें इंजीनियरिंग, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र और पर्यावरण विज्ञान जैसे अन्य क्षेत्रों से भी सीखना चाहिए। मैंने एक बार एक टीम के बारे में पढ़ा जिसने एक टिकाऊ पैकेजिंग समाधान विकसित करने के लिए डिज़ाइनर, इंजीनियर और सामग्री वैज्ञानिकों के साथ मिलकर काम किया। इसका परिणाम अद्भुत था। यह सिर्फ़ ‘ज्ञान’ इकट्ठा करने के बारे में नहीं है, बल्कि इसे ‘जोड़ने’ और ‘लागू’ करने के बारे में है। जब डिज़ाइनर इन विभिन्न क्षेत्रों से सीखते हैं, तो वे अधिक समग्र और प्रभावी समाधान बना सकते हैं।

2. भावनात्मक बुद्धिमत्ता और सहानुभूति

एक बार, मेरे एक ग्राहक ने मुझे बताया कि उन्हें मेरा डिज़ाइन इसलिए पसंद आया क्योंकि उन्हें लगा कि मैंने उनकी भावनाओं को समझा है। यह मेरे लिए एक महत्वपूर्ण सीख थी। डिज़ाइनर को न सिर्फ़ तकनीकी कौशल बल्कि भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence) और सहानुभूति (Empathy) भी विकसित करनी होगी। उन्हें यह समझना होगा कि लोग कैसा महसूस करते हैं, उनकी ज़रूरतें क्या हैं, और उनके दर्द क्या हैं। मैंने एक ऐसा डिज़ाइनर देखा जो अपने यूज़र्स के साथ समय बिताता था, उनके जीवन को समझने की कोशिश करता था, और फिर उनके लिए डिज़ाइन करता था। यह सिर्फ़ ‘मीटिंग’ करने से कहीं ज़्यादा है; यह ‘जुड़ने’ और ‘समझने’ के बारे में है। जब डिज़ाइनर सहानुभूति के साथ काम करते हैं, तो वे ऐसे उत्पाद और सेवाएँ बना सकते हैं जो वास्तव में लोगों के जीवन को बेहतर बनाते हैं, न कि सिर्फ़ उन्हें इस्तेमाल करने के लिए मजबूर करते हैं।

डिज़ाइन के महत्वपूर्ण पहलू विवरण क्यों महत्वपूर्ण है?
पर्यावरण-अनुकूल सामग्री नवीकरणीय, पुनर्चक्रित या बायोडिग्रेडेबल सामग्री का उपयोग। ग्रह पर नकारात्मक प्रभाव कम करता है, स्थिरता को बढ़ावा देता है।
उत्पाद जीवनचक्र विस्तार मरम्मत योग्य, अपग्रेड करने योग्य और लंबे समय तक चलने वाले उत्पादों का डिज़ाइन। कचरा कम करता है और संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करता है।
समावेशी पहुँच सभी क्षमताओं और पृष्ठभूमियों के उपयोगकर्ताओं के लिए डिज़ाइन। अधिक लोगों तक पहुँच सुनिश्चित करता है और सामाजिक समानता को बढ़ावा देता है।
नैतिक एआई और डेटा निष्पक्ष, पारदर्शी और उपयोगकर्ता की प्राइवेसी का सम्मान करने वाले डिजिटल डिज़ाइन। विश्वास बनाए रखता है और संभावित पूर्वाग्रहों को कम करता है।

डिज़ाइन की नैतिकता को अपनाना: मेरा व्यक्तिगत दृष्टिकोण

जब मैंने अपने ब्लॉग के लिए सामग्री बनाना शुरू किया, तो मैंने फैसला किया कि मैं सिर्फ़ लोकप्रिय विषयों पर नहीं लिखूँगा, बल्कि उन विषयों पर भी लिखूँगा जो मुझे नैतिक रूप से सही लगते हैं, भले ही उनमें कम व्यूज़ मिलें। यह एक मुश्किल फैसला था, लेकिन मैंने महसूस किया कि मेरी आवाज़ का एक मूल्य है। डिज़ाइन की नैतिकता अब सिर्फ़ एक ‘अच्छा विचार’ नहीं है, बल्कि एक अनिवार्य आवश्यकता है। यह सिर्फ़ ‘क्या अच्छा दिखता है’ या ‘क्या अच्छा बिकता है’ से आगे बढ़कर ‘क्या सही है’ के बारे में है। मुझे लगता है कि हर डिज़ाइनर को अपने काम के नैतिक निहितार्थों पर गहराई से विचार करना चाहिए। क्या हमारा डिज़ाइन किसी को नुकसान पहुँचा रहा है? क्या यह पर्यावरण के लिए हानिकारक है? क्या यह समावेशी है? ये वो सवाल हैं जो हमें हर रोज़ खुद से पूछने होंगे। मैंने खुद देखा है कि जब कोई ब्रांड नैतिक मूल्यों पर खरा उतरता है, तो लोग उससे भावनात्मक रूप से जुड़ते हैं। यह सिर्फ़ ‘मुनाफ़ा’ कमाने से कहीं ज़्यादा ‘भरोसा’ कमाने की बात है।

1. प्रभाव का मूल्यांकन और ज़िम्मेदारी स्वीकारना

एक बार मैंने एक प्रोजेक्ट पर काम किया था जहाँ हमने एक नई पैकेजिंग डिज़ाइन की थी। जब हमने बाद में इसका पर्यावरणीय प्रभाव देखा, तो हमें एहसास हुआ कि हमने कुछ गलतियाँ की थीं। यह एक कड़वा अनुभव था, लेकिन इसने हमें ज़िम्मेदारी स्वीकार करना सिखाया। डिज़ाइनर को अपने काम के प्रभाव का लगातार मूल्यांकन करना चाहिए, चाहे वह सामाजिक हो, पर्यावरणीय हो या आर्थिक हो। इसका मतलब है कि सिर्फ़ लॉन्च करके आगे बढ़ जाना नहीं, बल्कि परिणामों की निगरानी करना और ज़रूरत पड़ने पर सुधार करना। यह सिर्फ़ ‘क्या हुआ’ को समझने से कहीं ज़्यादा है; यह ‘क्यों हुआ’ को समझने और भविष्य में बेहतर करने के बारे में है। जब हम अपनी ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हैं, तो हम न केवल गलतियों से सीखते हैं, बल्कि हम एक अधिक विश्वसनीय और जवाबदेह पेशेवर भी बनते हैं।

2. बदलाव के लिए एक आवाज़ बनना

मैं हमेशा से मानता आया हूँ कि एक आवाज़ बदलाव ला सकती है। जब मैंने देखा कि कैसे एक छोटे से डिज़ाइन बदलाव ने किसी कंपनी को पर्यावरण के प्रति अधिक जागरूक बनाया, तो मुझे लगा कि मेरे काम का कितना बड़ा प्रभाव हो सकता है। डिज़ाइनर को सिर्फ़ ‘उत्पाद बनाने’ तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें उद्योग और समाज में बदलाव के लिए एक आवाज़ भी बनना चाहिए। इसका मतलब है कि वे अपने नैतिक मूल्यों के लिए खड़े हों, टिकाऊ प्रथाओं को बढ़ावा दें, और अनैतिक प्रथाओं को चुनौती दें। मैंने एक ऐसे डिज़ाइनर के बारे में पढ़ा जिसने अपनी कंपनी को एक विवादित प्रोजेक्ट से हटने के लिए मना लिया था क्योंकि वह नैतिक रूप से सही नहीं था। यह सिर्फ़ ‘नौकरी’ करने से कहीं ज़्यादा है; यह ‘नैतिक नेतृत्व’ दिखाने के बारे में है। जब हम बदलाव के लिए एक आवाज़ बनते हैं, तो हम न केवल अपने पेशे को ऊपर उठाते हैं, बल्कि हम एक बेहतर दुनिया बनाने में भी योगदान देते हैं।

समापन

मुझे उम्मीद है कि इस ब्लॉग पोस्ट ने आपको डिज़ाइन की नैतिकता के महत्व को समझने में मदद की होगी। यह सिर्फ़ सौंदर्य या कार्यक्षमता से कहीं बढ़कर है; यह समाज और पर्यावरण के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी का मामला है। एक डिज़ाइनर के रूप में, हमारा काम सिर्फ़ समस्याओं को हल करना नहीं, बल्कि भविष्य को आकार देना भी है। आइए हम सभी मिलकर ऐसे उत्पाद और सेवाएँ बनाएँ जो न केवल हमारे जीवन को बेहतर बनाएँ, बल्कि एक अधिक न्यायपूर्ण और टिकाऊ दुनिया का निर्माण भी करें। यह यात्रा लंबी है, लेकिन हर छोटा कदम मायने रखता है।

उपयोगी जानकारी

1. पर्यावरण-अनुकूल सामग्री का उपयोग करके अपने कार्बन फ़ुटप्रिंट को कम करें।

2. ऐसे उत्पादों का समर्थन करें जिन्हें मरम्मत किया जा सके या दोबारा इस्तेमाल किया जा सके।

3. डिजिटल उत्पादों का उपयोग करते समय अपनी डेटा प्राइवेसी सेटिंग्स की जाँच करें।

4. समावेशी डिज़ाइन वाले उत्पादों और सेवाओं की तलाश करें जो सभी के लिए सुलभ हों।

5. अपने दैनिक जीवन में छोटे-छोटे बदलाव लाकर नैतिक डिज़ाइन सिद्धांतों का पालन करें।

मुख्य बिंदुओं का सारांश

नैतिक डिज़ाइन अब डिज़ाइन जगत के लिए एक नया मानक बन गया है। इसमें पर्यावरण-अनुकूल सामग्री का उपयोग, उत्पादों के जीवनचक्र का विस्तार, डेटा प्राइवेसी और एल्गोरिथम निष्पक्षता सुनिश्चित करना, और सभी के लिए समावेशी पहुँच बनाना शामिल है। भविष्य के डिज़ाइनरों को अंतर्विषयक सोच, भावनात्मक बुद्धिमत्ता और सहानुभूति के साथ-साथ अपने काम के नैतिक प्रभावों का मूल्यांकन करने की आवश्यकता होगी। यह सिर्फ़ लाभ कमाने से कहीं ज़्यादा है; यह विश्वास बनाने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के बारे में है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) 📖

प्र: आज के दौर में डिज़ाइन को केवल ‘अच्छा दिखने’ से ज़्यादा क्यों माना जा रहा है?

उ: मुझे लगता है, यह बदलाव हमारे आस-पास हो रही तेज़ी से बदलती दुनिया की वजह से आया है। पहले डिज़ाइन सिर्फ़ एक चीज़ को सुंदर बनाने या उसे बाज़ार में बेचने तक सीमित था, लेकिन अब हम इसके दूरगामी प्रभावों को समझने लगे हैं। जैसे, जब आप कोई प्लास्टिक की बोतल ख़रीदते हैं, तो आप सिर्फ़ पानी नहीं पी रहे होते, बल्कि उसके बनने से लेकर उसके कचरे में तब्दील होने तक की पूरी यात्रा का हिस्सा बन रहे होते हैं। मेरे अनुभव में, अब उपभोक्ता भी समझदार हो गए हैं; वे केवल आकर्षक चीज़ें नहीं चाहते, बल्कि यह भी जानना चाहते हैं कि वह चीज़ कैसे बनी, क्या यह पर्यावरण के लिए ठीक है, और क्या इसे बनाने में किसी का शोषण तो नहीं हुआ?
आजकल, डिज़ाइनर को सिर्फ़ अपने ग्राहकों की नहीं, बल्कि इस धरती और आने वाली पीढ़ियों की भी ज़िम्मेदारी लेनी पड़ती है। यह सिर्फ़ एक ट्रेंड नहीं, बल्कि एक नैतिक अनिवार्यता बन गई है, एक ऐसा बदलाव जहाँ हर डिज़ाइनर को ‘मैं क्या बना रहा हूँ और इसका क्या असर होगा’ यह सोचना ही पड़ेगा।

प्र: एक उत्पाद के ‘लाइफ साइकिल’ की अवधारणा ‘फास्ट फैशन’ और नए गैजेट्स के मौजूदा चलन से कैसे संबंधित है?

उ: यह सवाल मेरे दिल के बहुत करीब है क्योंकि मैंने व्यक्तिगत रूप से देखा है कि कैसे एक छोटे से विचार से चीज़ें बड़ी समस्याएँ बन जाती हैं। जब मैंने पहली बार ‘लाइफ साइकिल’ के बारे में पढ़ा था, तो यह एक अकादमिक अवधारणा लगती थी, लेकिन अब यह हमारी रोज़मर्रा की वास्तविकता है। सोचिए, एक सस्ता टी-शर्ट जो आप आज ख़रीदते हैं, कुछ ही महीनों में उसे फेंक दिया जाता है – लेकिन उसके बनने में कितना पानी, कितने रसायन और कितनी ऊर्जा बर्बाद हुई?
यही बात गैजेट्स पर भी लागू होती है। हर साल नया फ़ोन, जबकि पुराना बिल्कुल ठीक काम कर रहा है। ‘लाइफ साइकिल’ हमें यह समझने में मदद करता है कि किसी भी उत्पाद का जीवन, उसके डिज़ाइन होने के पहले क्षण से लेकर उसके कचरे में बदलने तक, पर्यावरण और समाज पर क्या प्रभाव डालता है। ‘फास्ट फैशन’ और नए गैजेट्स का चलन इसी ‘लाइफ साइकिल’ को छोटा कर रहा है, जिससे संसाधनों की भारी बर्बादी हो रही है और धरती पर कचरे का बोझ बढ़ रहा है। मेरे हिसाब से, यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम सिर्फ़ तात्कालिक संतुष्टि के लिए सब कुछ दाँव पर लगा रहे हैं।

प्र: एक टिकाऊ और नैतिक भविष्य के लिए हमें किस तरह के डिज़ाइनरों की आवश्यकता है, खासकर AI-संचालित दुनिया में?

उ: मुझे लगता है कि हमें ऐसे डिज़ाइनरों की ज़रूरत है जो सिर्फ़ समस्याओं को हल न करें, बल्कि भविष्य की समस्याओं को रोकने के लिए डिज़ाइन करें। यह सिर्फ़ ‘एस्थेटिक्स’ या ‘फंक्शनैलिटी’ की बात नहीं है; यह ‘जिम्मेदारी’ की बात है। कल्पना कीजिए, एक AI-आधारित एप्लीकेशन जो आपके लिए हर चीज़ आसान बना रहा है, लेकिन क्या हमने कभी सोचा कि उस AI को बनाने में कितनी ऊर्जा खर्च हुई, या उसका डेटा कलेक्शन कितना नैतिक था?
भविष्य के डिज़ाइनर को न केवल उपयोगकर्ता के अनुभव को समझना होगा, बल्कि उन्हें उस उत्पाद के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) को भी समझना होगा। उन्हें ‘डीकंस्ट्रक्शन’ (deconstruction) और ‘रीसाइकिलिंग’ (recycling) के बारे में सोचना होगा, उत्पाद बनने से पहले ही। मेरे अनुभव में, यह एक ऐसा बदलाव है जहाँ डिज़ाइनर सिर्फ़ निर्माता नहीं, बल्कि संरक्षक और भविष्य के वास्तुकार बनेंगे। AI उन्हें डेटा और पैटर्न समझने में मदद करेगा, लेकिन अंतिम निर्णय, नैतिक और मानवीय मूल्य, डिज़ाइनर को ही लेने होंगे। हमें ऐसे ‘विजनरी’ (visionary) डिज़ाइनरों की ज़रूरत है जो केवल ट्रेंड्स को फॉलो न करें, बल्कि उन्हें परिभाषित करें, और ऐसा करें जो ग्रह और मानव समाज दोनों के लिए अच्छा हो।